निराशा

यूँ तो जब बारिश होती है
खिलती है दिल में धूप
धुली धुली सी शाम को देख
लगता है गुब्बारा बन उड़ जायें

पर आज है मन में अँधेरा
बंद कमरे वाली सीलन
अजीब सी छटपटाहत

जैसे कुछ खो गया है
जैसे कोई बड़ा नुक़सान हुआ है
जैसे साँसों में काँटे लगे हैं
और छाती पे ईंटें रखे हैं

इंतज़ार है मौसम बदलने का
और किसी रोशनदान के खुलने का
आज की सिसकी भर लेंगे यादों के दब्बे में
शायद रखे रखे पक के मीठी हो जाए

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One thought on “निराशा

  1. कमाल कर दिया। पक कर मीठी होने की आशा, निराशा की संभावनाए कितनी और गहन कर देती हैं। निराशा की भावना आशा से ही तो उत्पन्न होती है और उसी पर खत्म भी। इस से याद आया एक वाक्य जो मैंने लिखा था: The only way to turn away from despair is to also turn away from hope.

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